Offstumped – Commentary on Indian Politics

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Politics and Public Policy in India

Shveta Chhatra Revisited – In Hindi

हाल ही में बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के माध्यम से जों भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान शुरू हुए थे उनमे अगर एक बात साफ़ निकलकर आती हैं तो वह संविधान के मूल आधार से हटकर समस्याओं का उपाय निकालना. जब अन्ना हजारे Referendum की बात करते हैं और जब बाब रामदेव शस्त्र सेना की बात करते हैं तो वह एक तरह से संविधान के बौजूद राष्ट्र में बढती भ्रस्त्रचार से निराशा का प्रतिबिम्ब हैं.

आम तौर हम यह मानते हैं कि  भ्रष्टाचार के मूल कारण निजी जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन. पर यह बात बहुत कम लोग समझते हैं  कि सर्कार के वामपंथी नीतियों वजह से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता हैं.  जब हम वामपंथी नीतियों की बात करते हैं यह ध्यान में रखिये की सभी राजनीतिक दल इन नीतियों का पालन करते हैं.

आर्थिक और सामाजिक विषयों पर वामपंथी नीतियों का असर हमारे देश में 2004 से काफी जोर पकड़ा हैं जब से दिल्ली में कांग्रेस की सर्कार आई हैं. मूल रूप से इस वामपंथी  अजेंडा के सूत्रधार  हैं श्रीमती सोनिया गाँधी के अध्यख में घटित राष्ट्रीय सलाहकारी परिषद.

आम आदमी के हकों के नाम पर यह वामपंथी अजेंडा भ्रष्टाचार बढ़ा रहा हैं. इस बात को समझन बहुत ज़रूरी हैं.

हक  वह होते हैं जिन्हें हम अपने स्वेच्छा उपयोग कर सकते हैं.

हक वह होते हैं जों हमारी स्वेच्छा को बढाते हैं.

हक वह होते हैं जिनको लेकर हम अपने पैरों पर खड़े हो सके

हक वह होते हैं जिनके वजह से हमें किसी और पर निर्भर नहीं होना पड़े

आम आदमी के हकों के नाम पर श्रीमती सोनिया गाँधी के माध्यम से जों संवैधानिक बदलाव लाये गए हैं वह हक नहीं हैं आम आदमी की गुलामी बढाने वाले निती हैं

शिक्षा का हक शिक्षा पाने की स्वेच्छा नहीं दे रही हैं बल्कि शिक्षा पाने के लिए सर्कार पर निर्भरता बढा रही हैं

रोज़गार का हक रोज़गार पाने की स्वेच्छा नहीं   दे रही हैं बल्कि रोज़गार पाने के लिए सर्कार पर निर्भरता बढा रही हैं

आगे चलकर भूख से मुक्ति पर जों नया कानून की बात चल रही हैं सोनिया गाँधीजी के इशारे पर, वह भी भूख से मुक्ति तो दूर की बात, सामाजिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार और बढ़ाकर अनाज के लिए सरकार पर निर्भरता और भी बढा देगी.

तो  दोस्तों भ्रष्टाचार का मूल कारण कांग्रेस पार्टी के वामपंथी नीतियों का नतीजा हैं .

अगर हम इस बात को मान ले तो यह सवाल उठता हैं की भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाली अभियान वामपंथी नीटियो के खिलाफ क्यों नहीं हो रही हैं ?

बाबा रामदेव हो या अन्ना हजारे हो या भाजपा हो क्यों इनके माध्यम से वामपंथी नीतियों के खिलाफ कोई आवाज़ नहीं उठ रहा हैं ?

संघ के माध्यम से श्री मोहन भागवतजी का भी बयान आया हैं जिसमे नैतिक मूल्यों पर टिप्पणी तो की उन्हों ने पर आर्थिक और सामजिक विषयों पर वामपंथी नीतोयों  को लिकर उनका कोई टिप्पणी नहीं आया.

अक्सर भाजपा कि नेता राम राज्य की बात तो करते हैं पर उस राम राज्य में आर्थिक और सामजिक विषयों पर वामपंथी नीतियों का क्या स्थान होगा इस बात का खुलासा तो दूर इस विषय पर चर्चा करने से भी दूर रह गए हैं.

यह कैसा राम राज्य होगा जिसमे आम आदमी के हक के नाम पर सरकार पर निर्भरता और भी बढे ?

श्री मोहन भागवतजी के माध्यम से यह भी बयान आया हैं की वह छत्रपति शिवाजी के शासन प्रणाली में विशवास रखते हैं.

तो क्या हम यह मान ले की वह आर्थिक विषयो में सरकार की सीमित भूमिका में विश्वास रखते हैं ?

क्या वह कर नीतियों में निम्न और निश्चित मूल्य के सिद्धांत पर विशास रखते हैं ?

क्या वह विदेश व्यापार के विषय में स्वेच्छा पर विशास रखते हैं ?

हकीकत यह हैं की आर्थिक विषयों पर हिंदुत्व के मानने वाले राष्ट्रवादी भावनाओं में लपेटकर वही वामपंथी नीतियों का समर्थन करते हैं.

स्वदेशी के नाम पर जहां राष्ट्रवादी विचार धारा विदेश व्यापार पर प्रतिबन्ध का समर्थन करती हैं वही यह बात भूल गयी हैं महाभारत में नारद मुनि द्वारा  महाराज युधिष्ठिर को  विदेश व्यापार पर दिया गया अर्थशास्त्र क उपदेश  

अन्त्योदय के नाम पर जहां राष्ट्रवादी विचार धरा सरकार पर निर्भरता का समर्थन करती हैं वही यह बात भूल गयी हैं रामायण में भगवान श्री राम का वह अर्थशास्त्र पर उल्लेख जिस में आत्मनिर्भरता और अर्थ के उद्देश्य से जीवन में यत्न की बात कही गयी हैं 

हकीकत यह भी हैं कि राष्ट्रवाद को लेकर भावनात्मक तो होते हैं पर इस चक्कर में भारतीय अर्थशास्त्र की वह परंपरा भूल गए हैं  जिस परंपरा में आचार्य विष्णु गुप्त जैसे महात्मा कि गिनना होती हैं.

क्या उस समय के शिक्षा विधि और शिक्षक अगर सरकार पर निर्भर होते तो तक्षशिला गुरुकुल से विष्णु गुप्त द्वारा भारत क राजनैतिक पुनर्निर्माण हो पाता ?

आज राष्ट्रवादी राजनीती हिंदुत्व के नाम पर संस्कृतिक विषयो पर जहा अपने आप को भिन्न दिखलाती हैं वही आर्थिक और सामाजिक विषयों पर वामपंथी कांग्रेस पार्टी से अभिन्न हैं.

यह विडम्बना आज इस लिए हैं क्योंकि इस राष्ट्रवादी विचारधारा को मानाने वाले जहां छत्रपति शिवाजी को पूजते हैं वही छत्रपति शब्द में छत्र का अर्थ भूल गए हैं. जहाँ वह शिवाजी को भगवा से जोड़ते हैं वही उनके शासन क चिन्ह श्वेत छत्र को भूल गए हैं.

हमारे इतिहास में श्वेत छत्र  महाभारत से लेकर शिवाजी तक अर्थशास्त्र, संवैधानिक धर्म और शसान प्रणाली के परंपरा क चिन्ह हैं.

इस परम्परा के सिद्धांतों को समझ कर उसे आधुनिक जीवन तथा प्रजातंत्र में आर्थिक और अमजिक नीति का आधार बनाने में राष्ट्रवादी राजनीतिक संघटन विफल रही हैं.

आज अगर श्री सोनिया गाँधी के अध्यख में वामपंथी ईसाई मूल्यों के आधार पर आर्थिक और सामाजिक नीति और क़ानून बना रहे हैं तो वह राष्ट्रवादी संघटन के इसी विफलता का नतीजा हैं.

भारत देश एक ऐसे मोड पर आज खड़ा हैं जिसमे आर्थिक आकांक्षा की  आपूर्ति अत्यंत महत्वपूर्ण हो गयी हैं.  सांस्कृतिक विवादों में समय व्यर्थ करने के लिए आम आदमी में कोई उत्सुकता नहीं हैं.

इस वातावरण में  ऐसे राजनैतिक विचारधारा की ज़रूरत हैं जों अर्थशास्त्र, संवैधानिक धर्म और निजी जीवन में संस्कृतिक मूल्य – इन तीनों को साथ लेकर समाज में शासन और सरकार की भूमिका पर वामपंथी कांग्रेस से अपनी भिन्नता दिखला सके.

इस तरह के अजेंडा का उल्लेख आप यहाँ पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं.

श्वेत छत्र और अर्थशास्त्र की उस परंपरा के बारे में और जानने के लिए आप गूगल बुक्स पर इस पुरानी किताब में और पढ़ सकते हैं.

Filed under: Anna Hazare, उत्तर प्रदेश २०१२, Baba Ramdev, Offstumped, Offstumped in Hindi, Shveta Chhatra, Uttar Pradesh Polls 2012

Rahul Gandhi on Bhatta-Parsaul – Complicit or Incompetent ?

अब यह बात बिलकुल तय है कि सोमवार को राहुल गाँधी से प्रधान मंत्री को दिए गए बयान सच से हट कर काफी दूर थे.

पिछले ब्लाग पोस्ट में कांग्रेस द्वारा उत्तर प्रदेश में हस्तक्षेप की आशंका तब हुई जब हिंसा के आरोप लग रहे थे बिना किसी ठोस सबूत के. एक तरफ आज कांग्रेस के प्रवक्ता जहां मीडिया को दोषी ठहरा रहे हैं वहीँ दूसरी ओर राहुल गाँधी अपने बात पर अड़े रहे.  इस सारे व्यवहार से यह प्रश्न उठता हैं कि क्या  राहुल गाँधी  की राजनीतिक नादानी क फायदा उठाया जा रहा हैं ?

बलात्कार और हत्या के आरोप बहुत ही गंभीर आरोप हैं. जब यह आरोप पुलिस कर्मीयों पर लगाया जाता हैं तब यह गंभीरता और भी तीव्र हो जाती हैं. एक तरह ऐसे वक्तव्य पुलिस कर्मियों की बलिदानों की अवहेलना हैं क्योंकि आज तक राहुल गाँधी से भट्टी परसौल में हुई हिंसा में शहीद हुए पुलिस कर्मचारी के प्रति कोई वक्तव्य नहीं आया हैं.

क्या पुलिस कर्मचारी के जान किसानो के जान से कम हैं ?

क्या राहुलजी के लिए हत्या और बलात्कार के झूठे बयान देना इतना आसान हैं परन्तु हकीकत में शहीद हुए पुलिस कर्मचारी के प्रति हमदर्दी जाताना इतना मुश्किल ?

इस सारे घटनाक्रम से हम यह कल्पना कर सकते हैं की राहुलजी के शासन में किस तरह से तथ्यों से हटकर गैरज़िम्मेदार राजनीती की रचना की जायेगी.   राहुलजी ने भारतीय होने पर शर्मिंदगी की बात तो की पर उनके गैरज़िम्मेदार बयान पर शर्म  तो दूर की बात रहा गयी.

क्या राहुलजी की सोच अपनी नाम की कोई चीज़ भी हैं या वह अपने सलाहकार के विचारों को लेकर इतनी आसानी से प्रभावित हो जाते हैं ?

उत्तर प्रदेश के चुनावी रणभूमि में उन्हें इस सवाल का जवाब बार बार देना पड़ेगा.

चलिए इस ब्लॉग को व्यंग्य से अंत करते हैं, ऊपर पूछे सवाल के रचनात्मक जवाब की कल्पना करते हुए -मई नेम इसस पप्पू, पप्पू की नादानी …..

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Rajiv Gandhi Hastakshep Yojana

चलिए हिंदी में ब्लाग पढ़िए !

हाल ही में उत्तर प्रदेश राज्य के गति विधियों को लेकर जों  सनसनाती राजनीतिक माहौल पैदा किया गया था, आज उसे एक स्पष्ट रूप मिल गया है - ”राजीव गाँधी हस्तक्षेप योजना”

यह आश्चर्य जनक बात है कि कांग्रेस के महासचिव श्री राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश के ग्रेअटर नॉएडा क्षेत्र में हुए कथित हिंसा के घटनाओं को लेकर प्रधान मंत्री के पास तो पहुंचे पर यह कहने से रह गए कि आखिर वह प्रधान मंत्री से क्या मांग कर रहे थे. हिंसा की घटनाओं के लेकर केंद्र सर्कार कोई कदम तो नहीं उठाने वाली हैं, और ना ही राहुल गाँधी ने अपने माध्यम से कोई FIR दर्ज करने की बात कही. जब भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक कि बात आई तो राहुल गाँधी ने केंद्र सर्कार के तरफ  से कोई ठोस आश्वासन भी नहीं दिया.

मात्र विधायक की पेशकश से थोड़े ही भट्टा पारसौल गांव के हिंसा ग्रस्त किसानों को रहत मिलेगी ?

जब हिंसा के आरोप लगाये जा रहे हैं तो स्वाभाविक हैं कि राज्य सर्कार से  FIR अथवा जांच की मांग हो. परन्तु राहुल गाँधी के वक्तव्य में इन  दोनों ही बातो क ज़िक्र नहीं होने क एक ही मतलब निकलता है  की यह प्रधान मंत्री के निवास पर जाकर उत्तर प्रदेश के राज्य शासन में केंद्र का हस्तक्षेप की मांग कर आये हैं.

यह राजीव गाँधी हस्तक्षेप योजना नई नहीं हैं. यह इंदिरा गाँधी के ज़माने से चलती आ रही राज्य शासन में  हस्तक्षेप की लंबी परम्परा है.

इस परम्परा की सबसे latest  मिसाल है कर्नाटक के राज्यपाल भरद्वाज द्वारा उस राज्य में भाजपा की सर्कार के खिलाफ हस्तक्षेप.

अगले साल में होने वाले उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव को लेकर जिस तरह की तैयारियां हो रही है उनसे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं की आगे आगे राजीव गाँधी हस्तक्षेप योजना के माध्यम से उत्तर प्रदेश में  किस तरह की राजनीतिक खेल खेला जाएगा.

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